पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

जन्म तिथि

वैशाख, कृष्ण, षष्ठी, विक्रम सवत 1998 (राष्ट्रीय कैलेंडर के अनुसार 17 अप्रैल 1941)

जन्म स्थान

ग्राम बेरानी, ​​अविभाजित भारत का सिंध प्रांत।

माता-पिता

थाउमलजी सिरुमलानी और माता महगिबा

धर्म

हिंदू (सिंधी)

बचपन

बचपन में नाम आसुमल रखा गया। भारत पाकिस्तान विभाजन के कारण परिवार गुजरात के अहमदाबाद में स्थानांतरित हो गया।

शिक्षा

जयहिंद हाई स्कूल, अहमदाबाद में कक्षा 3 तक पढ़ाई की। पिता की मृत्यु के बाद उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा ।

विवाह

लक्ष्मी देवी से विवाह

बच्चे

नारायण साईं और भारती देवी

युगप्रवर्तक संत श्री आशारामजी बापू

आध्यात्मिक यात्रा

बालक आसुमल को बचपन से ही उनकी माता मेहंगीबा ने ध्यान की शिक्षा दी थी। उन्हें अक्सर प्राथमिक विद्यालय में दोपहर के भोजन के समय ध्यान करते देखा जाता था। उन्होंने 20 के दशक की शुरुआत में भगवान की तलाश में घर छोड़ दिया। वृन्दावन और केदारनाथ जैसे कई तीर्थों की यात्रा करने के बाद वे आध्यात्मिक गुरु की तलाश में नैनीताल पहुँचे। उन्हें 23 साल की उम्र में उनके सद्गुरु साईं लीलाशाहजी बापू ने ब्रजेश्वरी, मुंबई में आध्यात्मिकता के सर्वोच्च शिखर आत्मज्ञान तक पंहुचा दिया था। उसके बाद उन्होंने गुजरात के डिसा में 7 साल बिताए और कुण्डलिनी योग इत्यादि कई योग की क्रियाओं का अभ्यास किया।

विवेक - वैराग्य

10 वर्ष की अल्पायु में पिता की मृत्यु ने उनके हृदय को वैराग्य से भर दिया। उन्हें संसार की शून्यता , वैराग्य की अग्नि और ईश्वर के प्रति लालसा का एहसास हुआ, जिसके कारण वे शादी से 8 दिन पहले घर से भाग गए। उनके रिश्तेदारों ने उन्हें खोज लिया । बाद में उन्होंने नियति को स्वीकार कर शादी कर ली। अपनी शादी के बाद भी उन्होंने अपनी पत्नी लक्ष्मी देवी को सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त होने तक संयम बरतने के लिए मनाया ।

संगठन

अपने सद्गुरु साईं लीलाशाहजी बापू के आदेश के बाद 8 जुलाई 1971 को गुरुपूर्णिमा के अवसर पर वे अहमदाबाद लौट आए। उनके भक्तों ने 29 जनवरी 1972 को साबरमती नदी के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी बनाई, जो बाद में भारत में पहला आश्रम बन गया। भारत और विदेश में आश्रमों की संख्या बढ़कर 425 हो गई। इसके अलावा सामाजिक सेवा कार्यों को करने और समाज के लोगों को निस्वार्थ सेवा में भाग लेने के लिए एक मंच प्रदान करने के लिए 1400 से अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियों की स्थापना की गई।

बापूजी के जीवन के चमत्कार

  1. एक व्यवसायी ने एक प्रबुद्ध आत्मा के जन्म के देवी प्रेरणा से उनके जन्म से पहले एक बड़ा झूला लाया ।
  2. उन्होंने 8 साल की उम्र में एक बूढ़ी महिला को आशीर्वाद दिया, जब उसने अपने निर्दोष बेटे को जेल से रिहा कराने के लिए प्रार्थना की , फलस्वरूप वो बेटे रिहा हो गए ।
  3. आधी रात को मछुआरों के एक समूह ने उसे चोर समझकर उस पर हमला कर दिया । ध्यान के बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोलीं तो सभी ने समर्पण कर दिया ।
  4. डीसा में उन्होंने एक मृत गाय को जीवनदान दिया ।
  5. 29 अगस्त 2012 को, जिस हेलीकॉप्टर में वह यात्रा कर रहे थे वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया, लेकिन वे सभी यात्रियों और चालक दल के साथ बच गए ।
  6. भक्तों के अनेक अनुभव यह दावा करते हैं कि बापूजी की कृपा से उनके जीवन में चमत्कार हो रहे हैं ।
  7. कई साक्ष्य यह भी कहते हैं कि उन्होंने जंगली जानवरों का साहस के साथ सामना किया है और आबू में नल गुफा में खतरनाक सांपों और भालूओं के साथ भी वे बड़ी सहजता से रह गए ।

बापूजी द्वारा शुरू की गई सामाजिक सेवा परियोजनाएँ

समाज के नैतिक एवं चारित्रिक उत्थान हेतु प्रयास

निःशुल्क बाल उत्थान परियोजनाएँ: बाल संस्कार केंद्र, विद्यार्थी शिविर, स्कूलों में योग और उच्च संस्कार शिक्षा कार्यक्रम। भारत के युवाओं के लिए: युवा सेवा संघ, युवाधन सुरक्षा अभियान, व्यसनमुक्ति अभियान भारत की महिलाओं के लिए: महिला उत्थान मंडल, तेजस्विनी भाव, दिव्य शिशु संस्कार, महिला शिविरें

कमजोर वर्गों, आदिवासियों और गरीबों की मदद के लिए परियोजनाएं

भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ (बुजुर्ग गरीबों और बेरोजगारों के लिए एक योजना) आदिवासी क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं के भंडारे, गरीबों के लिए राशन कार्ड, शरबत एवं प्रसादी वितरण

समाज सुधार

वैलेंटाइन्स डे से समाज की रक्षार्थ 14 फरवरी को माता-पिता पूजा दिवस । 25 दिसम्बर से 1 जनवरी तक के सप्ताह में नैतिक एवं सांस्कृतिक पतन को रोकने हेतु 25 दिसम्बर को तुलसी पूजन दिवस । समाज को जहरीले रंगों के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए वैदिक होली महोत्सव ।

सनातन संस्कृति की रक्षा

भारतीय देशी गायों की रक्षा हेतु गौशालाओं की स्थापना । संकीर्तन यात्राएँ और संस्कृति रक्षक यात्राएँ। आयुर्वेदिक उपचार और औषधियाँ कम लागत पर उपलब्ध कराना, आयुर्वेदिक अनुसंधान को बढ़ावा देना।

आध्यात्मिक उत्कृष्टता

  1. 1893 में स्वामी विवेकानन्द जी द्वारा विश्व धर्म संसद में प्रतिनिधित्व किये जाने के ठीक 100 साल बाद, 1993 में बापूजी ने हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया।
  2. 2008 में उन्हें सभी धर्माचार्यों द्वारा धर्म रक्षा मंच का अध्यक्ष घोषित किया गया।
  3. 9001:2000 प्रमाणित आभा विश्लेषक डॉ हीरा तापड़िया ने दावा किया कि वह किसी व्यक्ति की आभा से नकारात्मकता को खीचने और अपनी आभा से सकारात्मकता उसमें भरने में सक्षम हैं। ऐसा कहा जाता है कि उनका सहस्त्रसार चक्र पूरी तरह से सक्रिय है, जो उनके आध्यात्मिकता में सर्वोच्च होने का प्रमाण देता है।
  4. बापूजी कुंडलिनी योग के समर्थ आचार्य हैं। उनके ध्यान योग शिविर में हजारों लोग ध्यान में गोते लगाते नजर आते थे।
  5. उन्हें प्राचीन वैदिक शास्त्रों का व्यापक ज्ञान है जोकि उनके सत्संगों और प्रवचनों में स्पष्ट नज़र आता है।