अहमदाबाद केस

जोधपुर में झूठी FIR दर्ज होने के मात्र दो महीने बाद अक्टूबर 2013 में सूरत की दो बहनों ने आशारामजी बापू और उनके बेटे नारायण साँईं के खिलाफ 12 वर्ष पूर्व की कल्पित कहानी बताकर प्राथमिकी दर्ज कराई थी । बड़ी बहन ने बापूजी पर 2001 की और छोटी बहन ने नारायण साँईं पर 2002 की तथाकथित घटना बताते हुये बलात्कार का आरोप लगाया है । इतने लम्बे अंतराल तक FIR दर्ज न कराने का कारण पूछने पर महिलाओं द्वारा कोई स्पष्ट एवं संतुष्टिकारक उत्तर नहीं दिया जाता लेकिन इस लंबे विलम्ब के बावजूद बिना किसी संयोगिक प्रमाण के केवल महिलाओं के विरोधाभासी बयानों के आधार पर आशारामजी बापू और नारायण साँईं को आजीवन कारावास की सजा सुना दी जाती है ।

दो

बहनो का सच
बड़ी बहन FIR में लिखती है कि 2001 में मेरे साथ बापू ने तथाकथित दुष्कर्म किया लेकिन छोटी बहन 2002 में नारायण साँईं के आश्रम में रहने के लिए आ जाती है ।
अगर किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो क्या वह अपनी सगी बहन को बाद में आश्रम में रहने के लिए जाने दे सकती है ? छोटी बहन 2005 और बड़ी बहन 2007 तक आश्रम में रही और 2010 में दोनों बहनों ने शादी कर ली । शादी के बाद भी जनवरी 2013 तक छोटी बहन अपने पति के साथ नारायण साँईं के सत्संग में आती थी जिसके फ़ोटो भी कोर्ट के रिकॉर्ड पर हैं । बड़ी बहन भी आश्रम छोड़ने के कुछ वर्षों बाद तक बापूजी के सत्संग में आती थी ।

आरोपों की कड़ियाँ कितनी कमजोर ...
अब सवाल उठता है कि :

अगर किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो क्या वह अपनी सगी बहन को बाद में आश्रम में रहने के लिए जाने दे जब ये बहनें आश्रम में रहती थीं, उस समय बड़ी बहन सन 2000-2001 से वक्ता थी और देशभर में जगह-जगह पर सत्संग व प्रचार की सेवा में जाती थी । वह स्वयं प्रचार समूह की मुखिया थी और पूरे महीने में केवल 7 या 8 दिन के लिए ही अहमदाबाद महिला आश्रम में आती थी तो..
  1. अगर इसके साथ दुष्कर्म हुआ होता तो क्या सालों तक यह महिला आशारामजी बापू का महिमा मंडन करती रहती ?
  2. जब यह महिला प्रचार की सेवा में देशभर में घूमती थी तब अगर इसके साथ तथाकथित दुष्कर्म होता था तो क्यों यह बार-बार वापस आश्रम आ जाती थी ?
  3. तथाकथित दुष्कर्म के बाद भी क्यों ये बहनें सालों तक आश्रम में रहीं ?
  4. आश्रम छोड़कर जाने के बाद भी क्यों ये दोनों बहनें आशारामजी बापू और नारायण साँईं के सत्संग में आती रहीं ?
  5. क्यों इन बहनों द्वारा 12 साल तक FIR दर्ज नहीं करवायी गयी ?
  6. 2003 में महिला को टीबी होने पर वह अपने घर गयी थी, थोड़े समय तक घर पर रुकी, फिर वापस वह आश्रम क्योंआ गयी थी ? (यह तथ्य कोर्ट के रिकॉर्ड पर है )
यही आरोपकर्त्री स्वयं अहमदाबाद गांधीनगर कोर्ट में अर्जी डालकर कहती है कि उसे बयान बदलना है लेकिन कोर्ट द्वारा उसकी अर्जी नामंजूर हो जाती है । इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने हेतु आरोपकर्त्री ने जो अर्जी बनवायी थी उसकी एक प्रति अदालत के रिकॉर्ड पर है । उसमें उसके खुद के हस्ताक्षर हैं और वह नोटराइज्ड है ।
उसमें उसने लिखा है कि शिकायत में जैसा लिखा है वास्तव में वैसा किसी भी आरोपी ने कुछ नहीं किया है । अतः वह फिर से बयान देना चाहती है लेकिन सरकार द्वारा विरोध करने पर आरोपकर्त्री की दोबारा बयान देने हेतु लगायी गयी अर्जी को कोर्ट नामंजूर कर देता है ।
आरोपकर्त्री का कहना है कि वह आशारामजी बापू को पहली बार जन्माष्टमी कार्यक्रम 1996 में सूरत आश्रम में मिली थी और उसी समय से बापूजी तथा अन्य आरोपियों ने मिलकर एक षड्यन्त्र के तहत उसको वक्ता बनाने की बात करके फँसाना चाहा था ।

सत्य :

1996 का जन्माष्टमी का कार्यक्रम सूरत में हुआ ही नहीं था बल्कि राजकोट में हुआ था । उस समय के राजकोट के न्यूजपेपर में यह खबर छपी थी । उस न्यूजपेपर के मालिक का बयान भी कोर्ट में हुआ और उन्होंने कोर्ट में यह स्वीकार किया कि “यह न्यूज़पेपर मेरा है और यह 1996 का है ।” इसके अलावा खुद अन्य सरकारी गवाहों ने भी इस बात की पुष्टि कोर्ट में की है ।

01

आरोपकर्त्री का कहना है कि 1997 में होली शिविर में आशारामजी बापू को वह सूरत आश्रम में मिली तो बापूजी ने कहा कि ‘तू वही लड़की है न जो मुझे मिली थी, जा जाकर अहमदाबाद में अनुष्ठान कर ।’ तब शिकायतकर्त्री महिला ने कहा था कि उसे दसवीं की परीक्षा देनी है ।

सत्य :

जब सूरत में कार्यक्रम हुआ ही नहीं था, राजकोट में हुआ था तो पहले मुलाकात का प्रश्न ही नहीं उठता । बचाव पक्ष की ओर से कोर्ट में प्रस्तुत किया गया गुजरात गवर्मेंट का एजुकेशन बोर्ड का रिकॉर्ड एवं एजुकेशन बोर्ड के अधिकारिक ऑफिसर के बयान से यह बात स्पष्ट होती है कि वास्तव में महिला 1997 में दसवीं कक्षा में थी ही नहीं । 1995 में आरोपकर्त्री महिला 2 बार दसवीं कक्षा में फेल हुई है ।

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आरोपकर्त्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि “2007 में मैंने निर्णय लिया कि मुझे अब आश्रम में रहना नहीं है तो मेरी जो मित्र थी उस मित्र से मैंने बात करी और उस मित्र की मदद से मैं आश्रम से भागकर सूरत में अपने माता-पिता के घर आ गयी ।”

सत्य :

इस मित्र ने भी शिकायतकर्त्री के कथन को समर्थन नहीं दिया है । स्वयं जाँच अधिकारी ने कोर्ट में इस बात को स्वीकार किया है लेकिन इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर द्वारा न तो उस मित्र के बयान को और न ही उस मित्र को कोर्ट के समक्ष बयान देने के लिए प्रस्तुत किया गया ।

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आरोपकर्त्री ने तथाकथित दुष्कर्म संबंधित आरोप के संबंध में बताया है कि “2001 गुरुपूर्णिमा के वक्त मुझे और एक अन्य साधिका को बापूजी की शांति वाटिका में ले जाया गया था । वहाँ पर उस दूसरी साधिका को बापूजी ने पहले बुलाया, उसके करीब 10 मिनट के बाद उसे जाने को बोला, मुझे बुलाया और मेरे साथ दुष्कर्म किया ।”

सत्य :

आरोपकर्त्री ने जिस दूसरी साधिका के साथ बापूजी के पास जाने की बात कही, उस साधिका का पुलिस ने 2 बार बयान दर्ज किया । उस दूसरी साधिका ने आरोपकर्त्री के बयान का खण्डन करते हुए अपना स्टेटमेंट दिया । लेकिन पुलिस ने न ही उस साधिका को और न ही उसके लिपिबद्ध बयान को कोर्ट में प्रस्तुत किया । स्वयं जाँच अधिकारी का जब कोर्ट में बयान हुआ तो उसने इस बात को स्वीकार किया कि उस दूसरी साधिका ने शिकायतकर्ता के बयान का समर्थन नहीं किया है अर्थात् ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं है ।

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आरोपकर्त्री ने ऐसे भी आरोप लगाये हैं कि अनुष्ठान पूरा करने के बाद सह-आरोपियों ने उसे वक्ता बनाने का लालच दिया और घर नहीं जाने दिया । 15 दिन के बाद उसकी माता उसे लेने आयी तब भी उसे ऐसा ही बोलकर जाने नहीं दिया गया ।

सत्य :

स्वयं आरोपकर्त्री की सगी बहन, जिसे बचाव पक्ष की ओर से पेश किया गया था, उसने अपने कोर्ट में हुए बयान में बताया कि 15 दिन के बाद वह, उसकी माता तथा परिवार के अन्य सदस्य आरोपकर्त्री को वापस लाने के लिए अहमदाबाद गये थे पर उसने आने से मना कर दिया । उसके कुछ दिनों के बाद अन्य परिवार के सदस्यों के साथ उसकी बहन दोबारा आरोपकर्त्री को वापस लाने के लिए गयी थी लेकिन तब भी उसने मना कर दिया था । कई बार आरोपकर्त्री को वापस घर आने के लिए कहते थे लेकिन वह मना करती रही । इसके अतिरिक्त आरोपकर्त्री की बहन ने यह भी बताया कि आरोपकर्त्री कई बार सूरत शहर में सत्संग करने हेतु आया करती थी । यह बात आरोपकर्त्री ने भी स्वयं अपने बयान में स्वीकार की है ।

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आरोपकर्त्री ने उस समय (यानी 2001 में) बापू आशारामजी की कुटिया में जिस रसोइए का होना बताया था, वास्तव में वह 2001 में तथाकथित घटना के समय रसोइया था ही नहीं । यह सत्य अन्य कई सरकारी गवाहों ने अपने बयान में कोर्ट के समक्ष स्वीकार किया है लेकिन कोर्ट द्वारा इस सत्य को नजरंदाज किया गया ।

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क्या यह न्याय है ? star.png

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TESTIMONIALS

~सुप्रीम कोर्ट

‘जिस केस में कोई भी प्रत्यक्ष साक्ष्य न हो उस केस में आरोपकर्त्री का बयान तभी सही माना जायेगा जब वह स्टर्लिंग विटनेस हो यानी उसके बयान में कहीं भी कोई विरोधाभास न हो ।’

ऐसे विरोधाभासी बयानों के आधार पर बिना किसी सबूत के भारत के एक संत, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन सनातन संस्कृति की सेवा में एवं देश-हित के कार्यों में समर्पित कर दिया, उनको आजीवन कारावास की सजा देना..

01

केरल के बिशप फ्रेंको मुलक्कल

आरोप : नन के साथ 13 बार रेप करने का आरोप
बेल : 26 दिन तक जेल, उसके बाद बेल पर रहते हुए निर्दोष बरी

02

दीपक चौरसिया और अन्य पत्रकार

आरोप : आशारामजी बापू को बदनाम करने के लिए नाबालिग बच्ची के विडियो को तोड़-मरोड़कर दिखाया, POCSO के तहत मामला दर्ज,
आज तक गिरफ्तारी नहीं

03

एक्टर पर्ल वी. पुरी

आरोप : POCSO एक्ट के तहत नाबालिग से रेप का मामला
बेल : मात्र 11 दिन में

04

गायत्री प्रजापति

आरोप : गैंगरेप केस
बेल : POCSO के बावजूद, स्वास्थ्य कारणों पर बेल

05

राज कुंद्रा

आरोप : अश्लील फिल्म बनाने और उसे अपने एप पर रिलीज करने के मामले में
गिरफ्तार
बेल : मात्र 2 महीने में